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महा दुखदाई बना परम आनंद हॉस्पिटल

महा दुखदाई बना परम आनंद हॉस्पिटल

शहडोल। परम आनंद अस्पताल में मनमानी का दौर लगातार जारी है। शासकीय नियम-निर्देशों एवं मापदण्डों से कोसों दूर इस अस्पताल के प्रबंधन ने शहर के नामी गिरामी विकित्सक व अस्पताल संचालक के लेटरहेड पर प्रिसक्रिप्शन लिखने की छूट देकर अस्पताल को मौत का प्रवेश द्वार बना देने का कार्य किया है। किसी भी चिकित्सक के छपे हुए पर्चे पर दवाइयां लिखना कानूनन अवैध तो है ही मरीजों की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ भी है जो इस निजी अस्पताल द्वारा सरेआम किया जा रहा है। परम आनंद अस्पताल शहर के प्रतिष्ठित व्यवसायी परिवार के डॉ. सत्येश विशिनदासानी एवं उनकी पत्नी डॉ. पूजा विशिनदासानी द्वारा खोला गया है। डॉक्टर दंपत्ति ने अस्पताल तो खोल लिया लेकिन अस्पताल में अधिकृत तौर पर किसी अन्य चिकित्सक की सेवाएं नहीं ली है।  ऑफ रिकार्ड किसी मंसूरी नामक तथाकथित डॉक्टर को रात्रिकालीन सेवा का दायित्व सौंप रखा है यानि किसी नौसिखिये के हाथ में अस्पताल की कमान सौंप दी गई है। उक्त व्यक्ति डॉक्टर है भी या नहीं इसमें संदेह है क्योंकि यदि वह डॉक्टर होता तो उसका नाम अस्पताल में डॉक्टरों की सूची में जरूर लिखकर लगाया जाता।


चिकित्सक का ये कैसा ज्ञान

परम आनंद अस्पताल संचालक ने जिस व्यक्ति को रात्रिकालीन व्यवस्था की कमान सौंपी गई है उसके चिकित्सकीय ज्ञान की कलई उस समय खुल गई जब उसने एक बाल मरीज को ऐसी दवा लिखी जो वास्तव में कोई कंपनी बनाती ही नहीं। ग्राम छतवई निवासी राजेंन्द्र मिश्रा ने अपनी  9 वर्षीया बेटी गुनगुन के पेट में दर्द होने पर 06 दिसम्बर की रात्रि करीब 10 बजे जब गांव से आते समय परम आनंद अस्पताल खुला देखा तो समय बचाने की गरज से वहां मौजूद कथित डॉक्टर के पास दिखाने ले गए। अस्पताल में मौजूद मंसूरी नामक तथाकथित डॉक्टर ने बच्ची को देखने के बाद गैस की समस्या बताई और दवा लिख दी जो पूरे शहर में कहीं नहीं मिली।


अस्पताल की दुकान में भी नहीं


गौरतलब है कि उक्त कथित डॉक्टर ने जो दवा लिखी वह शहर के किसी भी मेडिकल स्टोर में तत्समय और दूसरे दिन भी नहीं मिली और मिलती भी कैसे? यहां तक कि जब अगले दिन परम आनंद अस्पताल के मेडिकल स्टोर में गैस्टिका सीरप की मांग की गई तो वहां भी उक्त दवा उपलब्ध नहीं थी।


सीरप बनती ही नहीं


श्री मिश्रा ने बताया कि दवामांगने पर हर दवा विके्रता बस एक ही सवाल करता कि यह दवा किसने लिखी है। कोई नौसिखिया है क्या? दवा विक्रेताओं ने बताया कि गैस्टिका नाम की सिर्फ ड्रॉॅप आती है सीरप तो कंपनी बनाती ही नहीं है।


नहीं उठाया फोन


पीडि़त पिता ने दवा की अनुपलब्धता की स्थिति में अस्पताल एवं डॉक्टर से संपर्क करने का लगातार कई बार प्रयास किया लेकिन क्या मजाल कि फोन लग जाए या मोबाइल फोन रिसीव हो जाए। अस्पताल के लैण्ड लाइन नंबर पर उन्होंने 14 बार तथा डॉ. सत्येश बिशिनदासानी के सेल फोन पर चार बार कॉल करने के बावजूद जब फोन नहीं उठा और बच्ची की तबियत और बिगडऩे लगी तब जिला अस्पताल गए और वहां डॉ. मुकुन्द चतुर्वेदी ने उपचार किया।


जांच के बाद होगी कार्यवाही: डॉ. पांडेय


पीडित बच्ची के पिता राजेन्द्र मिश्रा ने इस मामले में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी राजेश पाण्डेय से शिकायत की है जिसमें डॉ. राजेश पाण्डेय ने मामले की जांच कराकर सख्त कार्यवाही का आश्वसन दिया है। श्री मिश्रा द्वारा सोहागपुर थाना में भी शिकायत दर्ज कराई गई है।

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